16 May 2026

बेबाकी के कुछ पल

ये बाढ़ भी जैसे एक तरफ़ा जज़्बात हैं

कभी रुकते हैं, कभी टलते हैं

और कभी दफ़न होकर साये में चलते हैं....


( Apni marzi se kahan apne safar ke him hain, rukh jidhar ka hai udhar ke hum hain 🎼 by jagjit Singh)


मर्ज़ी की बात ना करो, ये तो बस एक छलावा है

हमारी ख्वाहिशों पर इस दुनिया की नज़र आजकल थोड़ी ज़्यादा है..

ज़हन में उनके पल रहा जैसे एक जलता हुआ लावा है

कैसे समझायें हम की शौक हमारा सादा, नेक इरादा है..


7 March 2024

तेरी बातों में ऐसा...

सुरों की मुश्ताक़ महफ़िल, दरिया के जैसे बहने लगी..

कितने अनजान रास्तों पर, चांदनी यूँ ही सजने लगी..

इक गैर सी अजनबी सी शाम, जाने कब अपनी सी लगने लगी..

बेगाने निकले थे घर के लिए, मंज़िल भी मानो अब चुभने लगी..

6 October 2011

कुछ क्लिष्ट पंक्तियाँ ॥


दिल
हल्क़ा करने के लिए कुछ ठिकाने चाहिए, शायरी उनमें से एक है..

हम ये कभी नहीं कहते कि हम शायर हैं,
वो तो बस औरों की कदर करना हमारी आदत है Usual Smile

तो आइये और शामिल हो जाइये इस महफ़िल में आप सभी!!


(...) => किसी बेहतर शायर का कलाम

3 October 2011

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( मुद्दतों बाद किसी से चाह हुई, मुद्दतों बाद किसी से दीदार हुआ
आज मिले फिर हम जब उनसे तो लगा कि फिर से इस दिल को प्यार हुआ॥ )

ख़यालों में किसी को लाकर हुआ ये एहसास, कि हमारे नसीब में नहीं है उनकी एक झलक
प्यार तो हम बहुत पीछे छोड़ आये, वो तो बस चाह को सहेज कर रखा है अब तलक..


( ख़यालों में किसी और को बसाये, नसीब अपना किसी और से बनाये
चाहत किसी और की दिल में दबाये, ऐसे लोगों को देवदास बोलते हैं समर भाई.. )

ज़माना कितनी भी करे चर्चा, हम बुझने ना देंगे चाहत की ये आस
ये ज़िल्लत-ए-रुसवाई सहने के बाद, कोई गिला नहीं गर लोग हमें फिर कहें देवदास या कालिदास..


( ख़यालों में कभी हमें भी लाकर देखो, अपना नसीब हमसे भी बना कर देखो
प्यार तो किया तुमने बहुत लोगों से अब तक, कभी हमें भी आज़मा कर देखो.. )
ये ख़यालों के साए न देंगे हमें जीने, और रहने तुमसे दूर
मुक़द्दर में नहीं प्यार तुम्हारा, हम तो बस खुश हैं पाकर ये सुरूर..

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18 February 2010

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(अच्छा हुआ कि आप गए .. हमें तो लगा था कि कोई कदरदान नहीं मिलेगा …)

यूँ इस तरह तुम हमें शर्मिन्दा ना करो,
कि आपकी कदर करना तो हमारे लिए इनायत है


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12 February 2010

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तारीफ उनकी करो, जो इस काबिल होते हैं..
हम तो एक काफिर हैं जो इज्ज़त पा के भी खोते हैं


शायर भी एक तरह का काफ़िर होता है,
जो सिर्फ दुश्मनी की कला में माहिर होता है


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2 February 2010

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मजबूरियों की फ़िक्र क्यूँ करते हो,
जब दोस्तों कों ही दुश्मनी की शिकायत है


आज वो मुझसे शिकायत करते हैं, और कहते हैं कि हमारे दिल के तुम करीब नहीं
अब उन्हें हम किस तरह समझाएँ, कि बनना चाहते हम उनके दिल के रकीब नहीं


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31 January 2010

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क्या सुनाएँ हम अपनी दास्ताँ, कि दर्द ठहरता नहीं अब तो सीने में

दिल ही दिल में कर लेते हैं बयाँ, कि अकेले आता नहीं मज़ा अब तो जीने में


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28 January 2010

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( मिटटी मेरी कब्र से चुरा रहा है कोई,
मर कर भी याद रहा है कोई,
खुदा इक पल की ज़िन्दगी और दे मुझे,
कि उदास मेरी कब्र से जा रहा है कोई...)

तुम्हारी कब्र से मिट्टी आजकल चुराता है सारा ज़माना,
ये इल्ज़ाम आज के बाद सिर्फ हम पर मत लगाना,
फिर जब तक ज़िन्दगी रहती है, क्यूँ हमसे गिला करते हैं वो,
जब हमारी कब्र पर बाद में उन्हें आकर पड़ता है आँसू बहाना॥



( कब्र की मिटटी उठा ले गया कोई,
उसी बहाने हमें छूकर गया कोई,
तन्हाई और अँधेरे में खुश थे हम,
लेकिन फिर से इंतज़ार करने की वजह दे गया कोई.... )

कब्र से मिटटी उठाने की दास्तान बहुत पुरानी है,
हमारे लिए ये उनके वजूद की बस इक निशानी है,
छू ना सके ताउम्र उन्हें हम अपनी मर्ज़ी से तो क्या,
हमने महसूस किया इस मिटटी में अभी बाकी उतनी ही जवानी है॥



( जनाज़ा तेरा उठा जो, मय्यत में हम आये
कब्र में तेरी बैठकर, मिलने के सपने सजाये ..

सोचा था दुनिया के डर से , उन्होंने हमें नहीं अपनाया
इसलिये कब्र में उनकी बैठकर, इंतज़ार करने को जी आया..

मेरे सनम ने पता नहीं, लोगों को क्या समझाया
लोगों ने आकर उनको, दूसरी कब्र में दफनाया..

खुदा , आज तुझसे सवाल करने को मन आया
लोग तो उसके थे पर आज तुझसे भी क्यों हमने दगा खाया … )

जनाज़ा तेरा उठने ना देंगे, गर मय्यत में तेरी हम पाए,
कब्र तेरी खुदने भी ना देंगे, गर मरने से पहले हम ना मिल पाए,

दुनिया से डरते डरते भी तूने मेरे इलज़ाम अपने सर लगाये,
क्या जानते थे हमारे इंतज़ार में तूने भी कितने ज़ख्म हैं खाए,

मौत के बाद भी सनम तेरे वही तेवर फिर नज़र आये,
खुदा ऐसी क्या खता थी मेरी, कि हम उसे इतना भाये,

पहले तो हम पर खून का इलज़ाम लगवाकर, हमारा क़त्ल करवा दिए,
और ख्याल रख सको हमारा, इस खातिर कब्रिस्तान में भी पड़ोसी बना लिए॥

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20 January 2010

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( भूले है रफ्ता-रफ्ता उन्हें मुद्दतों में हम,
किश्तों में खुदकुशी का मज़ा हम से पूछिये... )

इसे खुद-कुशी का मंज़र नहीं, अकेलेपन का सबब कहिये हुज़ूर,
उन्हें भूल पाने का आसरा दिल कों देकर भी ये ज़ख्म-ऐ-जिगर कम नहीं हुआ करते॥



( करता शिकायत ज़माने से कोई,
अगर मान जाता मनाने से कोई,
किसी कों क्यों याद करता कोई,
अगर भूल जाता भुलाने से कोई... )

शिकायतों का सिलसिला जो अब चल ही निकला है,
तो फिर दोष मत दो उन ज़ालिम हसीनाओं कों,
क्यूँकि दिल तो उनके सीने में भी धड़कता है, और याद हमें भी करता है,
बस फर्क इतना है कि हमें भूल पाने की कोशिश नहीं करते वो॥


( राह उनकी देखते देखते, आँखें फिर थका दीं
आये वो तो क्या हुआ, अपनी तस्वीर तो भिजवा दीं
तस्वीर मे देखकर उनको आज, आज फिर हम शरमा गए
गुज़रे वक़्त की याद मे, आज फिर खुद को भुला गए... )

तेरी बंदगी ने हमें तेरे दामन में फिर से लाकर छोड़ दिया
अब कोई पहलू न भीगे, इसलिए अपना रास्ता मय-खाने की तरफ मोड़ दिया
छाया रहे हरदम तेरा बेदम नशा इस रूह पर ऐ नर्गिस-इ-कायनात,
ये ही सोच कर तेरे नाम का एक जाम अपने मय-कदे में अब से हमने जोड़ दिया॥


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10 January 2010

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( अश्कों के मायने खो गए, जब से हम दफ़न हो गए
करते-करते अकले बातें ,अरमान सारे ख़तम हो गए
जो पड़ोस से आई तेरी खुशबू, जज्बातों कों फिर हवा मिली
उठ बैठे कब्र में वापस, उम्मीद है फिर तेरे से वफ़ा की .... )

अकेले गुजारी है सारी ज़िन्दगी, दिल कों तेरी यादों का आसरा देके,
उठकर बैठे ज़रूर हैं, मगर ये न समझना कि हम सिर्फ तुझे ही देखे,
यहाँ और भी हसीनायें मौजूद हैं अपनी तबाही की दास्ताँ लेके,
आज बता भी दे कि ऐसा क्या था तुझमे ऐ कातिल, कि ये कदम सिर्फ तुझ पर बहके॥



( यादों का आसरा दिल को देते रहे, आँख उठी जब भी तेरे को ढूँढते रहे
तू मिली तो ना सही, अपने आंसुओं से तेरी तस्वीर को भिगोते रहे
एक दिन आयेगी तू यही सोचकर, और हसीनों की तरफ कदमो कों जाने से रोकते रहे
कातिल तेरी एक झलक के लिए, ज़िन्दगी भर मयखाने का रास्ता खोजते रहे... )

जानते हैं कि तू लौट कर अब कभी नहीं आएगी, चाहे किसी और का दामन थाम लूँ
मगर तुझे पाने कि ये तलब कभी नहीं जाएगी, चाहे किसी और हसीना का नाम लूँ
ये मत समझना कि तेरी तस्वीर कों भिगोया है हमने अपने अश्कों से,
अश्क तो बहते हैं उन हसीनो के अक्सर, जिनके पहलू आज भी तेरे नाम से सजा कर रखूँ॥



( लौट कर आने वालों की राह हम फिर देखते नहीं
जो गुजर गया उसके बारे में कभी फिर सोचते नहीं
किससे क्या गिला करें, कोई यहाँ हमारा नहीं
यह ज़िन्दगी हमारी है और हमें इसे जीना है ... )

राह उनकी मत देखो अब कि आँखें थक जायेंगी,
और फिर उनके आते ही ये निगाहें भी झुक जायेंगी,
तब कहोगे कि गुज़रा वक़्त लौट आने कों बेताब है,
सारी शिकायतें वहीं दम तोड़ देंगी, रुक जायेंगी॥



( लौट कर आने वालों की राह देखना नहीं
गुजर गया जो उसके बारे में फिर सोचना नहीं
मिला आखिर सब कुछ एक तेरे सिवा, फिर क्या गिला
देख जरा गौर से, ज़िन्दगी मुसकरा रही है
फिर जीने के लिए बुला रही हैं, फिर जीने के लिए बुला रही हैं.. )

तू मिलेगी नहीं इसलिए राह तकना छोड़ दिया,
और फिर घूम के मंज़र ने भी अपना रास्ता मोड़ दिया,
मत घबराना शायर तू अपने हालात से, इस बात से,
तेरी ख़ुमारी ने हमें उनकी यादों से दोबारा जोड़ दिया॥

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15 December 2009

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( एक उभरते शायर कों आज फिर बदनाम किया
शायरी कों उसकी आज, किसी और का नाम दिया
तेरे साथ जोड़कर मुझे आज ग़ालिब’,
ज़माने ने फिर, सरे आम मुझे नीलाम किया... )

बदनाम वो शायर हैं जिनका अपना नाम नहीं,
जो नाम कमा चुके हैं उनको डरने का काम नहीं,
हम तो तेरा नाम सुनते ही ग़ालिब कों याद करते हैं,
गर इसे तारीफ न समझे ना सही, मगर समझ इसे इलज़ाम नहीं॥



( उभरता हुआ एक शायर, आज फिर घबरा गया
उसकी चतुराई , तुमको शक है गया
नाम मेरा अपने नाम के साथ सुनकर
कब्र मे 'ग़ालिब' आज फिर मुस्करा गया... )

इस ख़ुशी में घबराना हर किसी के बस कि बात नहीं,
हम पर शक का इल्ज़ाम लगा ना, ऐसी हमारी ज़ात नहीं,
कुछ तो बात है उस ग़ालिब में जो कब्र में भी मुस्कुराता है
और कहता है ऐ चतुर, गले मिलकर शाबाशी दूँ ऐसे मेरे हालत नहीं॥


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ये घबराहट एक सच्चे दिल की पहचान है
क्यूँकि ये एहसास बस चन्द लम्हों का मेहमान है,
जब दस्तक दी होगी दरवाज़े पर, तब वक़्त कुछ और था,
अब तो दूर रहकर हर घड़ी उनसे मिलने का अरमान है,
रुस्वाइयाँ लोगों से नहीं, अपने आप से होती है,
तुम डरते हो हमें खोने से, इस बात से हम भी अनजान नहीं,
गुजारिश हम भी करते हैं उस रब से, मगर फर्क सिर्फ इतना है,
न आप ऊपर जाएँ न हम, बस जितना हो सके उतना वक़्त मुस्कुराते हुए साथ बिताना है


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13 December 2009

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( चंद लम्हों की जिन्दगानी है,
नफरतों से जिया नहीं करते,
लगता है अब दुश्मनों से गुजारिश करनी पड़ेगी...
क्यूँकि दोस्त तो याद किया नहीं करते... )

वो ज़िन्दगी ही क्या जो चंद लम्हों में गुज़र जाए,
वो नफरतें ही क्या जो पल भर में उतर जाए,
एक तो हमारी बराबरी दुश्मनों से करते हो,
और फिर दोस्त कह कर तन्हाई में याद भी करते हो॥



( दर्द--दिल में कमी हो जाए
दोस्ती दुश्मनी हो जाए
तुम मेरी दोस्ती का दम भरो
आसमान मुद्दई हो जाए... )

दर्द--दिल में कमी ना हो तो दिल बेकरार रहता है,
दोस्ती दुश्मनी ना भी हो, फिर भी प्यार तो रहता है,
हमारे दम से ही है ये अपनी दोस्ती सलामत,
क्यूँकि इस मुद्दयी आसमान कों मनाना ही आखिर सबका मुकाम रहता है॥

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