ये बाढ़ भी जैसे एक तरफ़ा जज़्बात हैं
कभी रुकते हैं, कभी टलते हैं
और कभी दफ़न होकर साये में चलते हैं....
( Apni marzi se kahan apne safar ke him hain, rukh jidhar ka hai udhar ke hum hain 🎼 by jagjit Singh)
मर्ज़ी की बात ना करो, ये तो बस एक छलावा है
हमारी ख्वाहिशों पर इस दुनिया की नज़र आजकल थोड़ी ज़्यादा है..
ज़हन में उनके पल रहा जैसे एक जलता हुआ लावा है
कैसे समझायें हम की शौक हमारा सादा, नेक इरादा है..
