7 March 2024

तेरी बातों में ऐसा...

सुरों की मुश्ताक़ महफ़िल, दरिया के जैसे बहने लगी..

कितने अनजान रास्तों पर, चांदनी यूँ ही सजने लगी..

इक गैर सी अजनबी सी शाम, जाने कब अपनी सी लगने लगी..

बेगाने निकले थे घर के लिए, मंज़िल भी मानो अब चुभने लगी..