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( एक उभरते शायर कों आज फिर बदनाम किया
शायरी कों उसकी आज, किसी और का नाम दिया
तेरे साथ जोड़कर मुझे आज ऐ ‘ग़ालिब’,
ज़माने ने फिर, सरे आम मुझे नीलाम किया... )
बदनाम वो शायर हैं जिनका अपना नाम नहीं,
जो नाम कमा चुके हैं उनको डरने का काम नहीं,
हम तो तेरा नाम सुनते ही ग़ालिब कों याद करते हैं,
गर इसे तारीफ न समझे ना सही, मगर समझ इसे इलज़ाम नहीं॥
( उभरता हुआ एक शायर, आज फिर घबरा गया
उसकी चतुराई , तुमको शक है आ गया
नाम मेरा अपने नाम के साथ सुनकर
कब्र मे 'ग़ालिब' आज फिर मुस्करा गया... )
इस ख़ुशी में घबराना हर किसी के बस कि बात नहीं,
हम पर शक का इल्ज़ाम लगा ना, ऐसी हमारी ज़ात नहीं,
कुछ तो बात है उस ग़ालिब में जो कब्र में भी मुस्कुराता है
और कहता है ऐ चतुर, गले मिलकर शाबाशी दूँ ऐसे मेरे हालत नहीं॥
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ये घबराहट एक सच्चे दिल की पहचान है
क्यूँकि ये एहसास बस चन्द लम्हों का मेहमान है,
जब दस्तक दी होगी दरवाज़े पर, तब वक़्त कुछ और था,
अब तो दूर रहकर हर घड़ी उनसे मिलने का अरमान है,
रुस्वाइयाँ लोगों से नहीं, अपने आप से होती है,
तुम डरते हो हमें खोने से, इस बात से हम भी अनजान नहीं,
गुजारिश हम भी करते हैं उस रब से, मगर फर्क सिर्फ इतना है,
न आप ऊपर जाएँ न हम, बस जितना हो सके उतना वक़्त मुस्कुराते हुए साथ बिताना है ॥
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15 December 2009
13 December 2009
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( चंद लम्हों की जिन्दगानी है,
नफरतों से जिया नहीं करते,
लगता है अब दुश्मनों से गुजारिश करनी पड़ेगी...
क्यूँकि दोस्त तो याद किया नहीं करते... )
वो ज़िन्दगी ही क्या जो चंद लम्हों में गुज़र जाए,
वो नफरतें ही क्या जो पल भर में उतर जाए,
एक तो हमारी बराबरी दुश्मनों से करते हो,
और फिर दोस्त कह कर तन्हाई में याद भी करते हो॥
( दर्द-ऐ-दिल में कमी न हो जाए
दोस्ती दुश्मनी न हो जाए
तुम मेरी दोस्ती का दम न भरो
आसमान मुद्दई न हो जाए... )
दर्द-ऐ-दिल में कमी ना हो तो दिल बेकरार रहता है,
दोस्ती दुश्मनी ना भी हो, फिर भी प्यार तो रहता है,
हमारे दम से ही है ये अपनी दोस्ती सलामत,
क्यूँकि इस मुद्दयी आसमान कों मनाना ही आखिर सबका मुकाम रहता है॥
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( चंद लम्हों की जिन्दगानी है,
नफरतों से जिया नहीं करते,
लगता है अब दुश्मनों से गुजारिश करनी पड़ेगी...
क्यूँकि दोस्त तो याद किया नहीं करते... )
वो ज़िन्दगी ही क्या जो चंद लम्हों में गुज़र जाए,
वो नफरतें ही क्या जो पल भर में उतर जाए,
एक तो हमारी बराबरी दुश्मनों से करते हो,
और फिर दोस्त कह कर तन्हाई में याद भी करते हो॥
( दर्द-ऐ-दिल में कमी न हो जाए
दोस्ती दुश्मनी न हो जाए
तुम मेरी दोस्ती का दम न भरो
आसमान मुद्दई न हो जाए... )
दर्द-ऐ-दिल में कमी ना हो तो दिल बेकरार रहता है,
दोस्ती दुश्मनी ना भी हो, फिर भी प्यार तो रहता है,
हमारे दम से ही है ये अपनी दोस्ती सलामत,
क्यूँकि इस मुद्दयी आसमान कों मनाना ही आखिर सबका मुकाम रहता है॥
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