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( एक उभरते शायर कों आज फिर बदनाम किया
शायरी कों उसकी आज, किसी और का नाम दिया
तेरे साथ जोड़कर मुझे आज ऐ ‘ग़ालिब’,
ज़माने ने फिर, सरे आम मुझे नीलाम किया... )
बदनाम वो शायर हैं जिनका अपना नाम नहीं,
जो नाम कमा चुके हैं उनको डरने का काम नहीं,
हम तो तेरा नाम सुनते ही ग़ालिब कों याद करते हैं,
गर इसे तारीफ न समझे ना सही, मगर समझ इसे इलज़ाम नहीं॥
( उभरता हुआ एक शायर, आज फिर घबरा गया
उसकी चतुराई , तुमको शक है आ गया
नाम मेरा अपने नाम के साथ सुनकर
कब्र मे 'ग़ालिब' आज फिर मुस्करा गया... )
इस ख़ुशी में घबराना हर किसी के बस कि बात नहीं,
हम पर शक का इल्ज़ाम लगा ना, ऐसी हमारी ज़ात नहीं,
कुछ तो बात है उस ग़ालिब में जो कब्र में भी मुस्कुराता है
और कहता है ऐ चतुर, गले मिलकर शाबाशी दूँ ऐसे मेरे हालत नहीं॥
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ये घबराहट एक सच्चे दिल की पहचान है
क्यूँकि ये एहसास बस चन्द लम्हों का मेहमान है,
जब दस्तक दी होगी दरवाज़े पर, तब वक़्त कुछ और था,
अब तो दूर रहकर हर घड़ी उनसे मिलने का अरमान है,
रुस्वाइयाँ लोगों से नहीं, अपने आप से होती है,
तुम डरते हो हमें खोने से, इस बात से हम भी अनजान नहीं,
गुजारिश हम भी करते हैं उस रब से, मगर फर्क सिर्फ इतना है,
न आप ऊपर जाएँ न हम, बस जितना हो सके उतना वक़्त मुस्कुराते हुए साथ बिताना है ॥
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