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क्या सुनाएँ हम अपनी दास्ताँ, कि दर्द ठहरता नहीं अब तो सीने में
दिल ही दिल में कर लेते हैं बयाँ, कि अकेले आता नहीं मज़ा अब तो जीने में ॥
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31 January 2010
28 January 2010
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( मिटटी मेरी कब्र से चुरा रहा है कोई,
मर कर भी याद आ रहा है कोई,
ऐ खुदा इक पल की ज़िन्दगी और दे मुझे,
कि उदास मेरी कब्र से जा रहा है कोई...)
तुम्हारी कब्र से मिट्टी आजकल चुराता है सारा ज़माना,
ये इल्ज़ाम आज के बाद सिर्फ हम पर मत लगाना,
फिर जब तक ज़िन्दगी रहती है, क्यूँ हमसे गिला करते हैं वो,
जब हमारी कब्र पर बाद में उन्हें आकर पड़ता है आँसू बहाना॥
( कब्र की मिटटी उठा ले गया कोई,
उसी बहाने हमें छूकर गया कोई,
तन्हाई और अँधेरे में खुश थे हम,
लेकिन फिर से इंतज़ार करने की वजह दे गया कोई.... )
कब्र से मिटटी उठाने की दास्तान बहुत पुरानी है,
हमारे लिए ये उनके वजूद की बस इक निशानी है,
छू ना सके ताउम्र उन्हें हम अपनी मर्ज़ी से तो क्या,
हमने महसूस किया इस मिटटी में अभी बाकी उतनी ही जवानी है॥
( जनाज़ा तेरा उठा जो, मय्यत में हम न आये
कब्र में तेरी बैठकर, मिलने के सपने सजाये ..
सोचा था दुनिया के डर से , उन्होंने हमें नहीं अपनाया
इसलिये कब्र में उनकी बैठकर, इंतज़ार करने को जी आया..
मेरे सनम ने पता नहीं, लोगों को क्या समझाया
लोगों ने आकर उनको, दूसरी कब्र में दफनाया..
ऐ खुदा , आज तुझसे सवाल करने को मन आया
लोग तो उसके थे पर आज तुझसे भी क्यों हमने दगा खाया … )
जनाज़ा तेरा उठने ना देंगे, गर मय्यत में तेरी हम आ न पाए,
कब्र तेरी खुदने भी ना देंगे, गर मरने से पहले हम ना मिल पाए,
दुनिया से डरते डरते भी तूने मेरे इलज़ाम अपने सर लगाये,
क्या जानते थे हमारे इंतज़ार में तूने भी कितने ज़ख्म हैं खाए,
मौत के बाद भी ऐ सनम तेरे वही तेवर फिर नज़र आये,
ऐ खुदा ऐसी क्या खता थी मेरी, कि हम उसे इतना भाये,
पहले तो हम पर खून का इलज़ाम लगवाकर, हमारा क़त्ल करवा दिए,
और ख्याल रख सको हमारा, इस खातिर कब्रिस्तान में भी पड़ोसी बना लिए॥
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( मिटटी मेरी कब्र से चुरा रहा है कोई,
मर कर भी याद आ रहा है कोई,
ऐ खुदा इक पल की ज़िन्दगी और दे मुझे,
कि उदास मेरी कब्र से जा रहा है कोई...)
तुम्हारी कब्र से मिट्टी आजकल चुराता है सारा ज़माना,
ये इल्ज़ाम आज के बाद सिर्फ हम पर मत लगाना,
फिर जब तक ज़िन्दगी रहती है, क्यूँ हमसे गिला करते हैं वो,
जब हमारी कब्र पर बाद में उन्हें आकर पड़ता है आँसू बहाना॥
( कब्र की मिटटी उठा ले गया कोई,
उसी बहाने हमें छूकर गया कोई,
तन्हाई और अँधेरे में खुश थे हम,
लेकिन फिर से इंतज़ार करने की वजह दे गया कोई.... )
कब्र से मिटटी उठाने की दास्तान बहुत पुरानी है,
हमारे लिए ये उनके वजूद की बस इक निशानी है,
छू ना सके ताउम्र उन्हें हम अपनी मर्ज़ी से तो क्या,
हमने महसूस किया इस मिटटी में अभी बाकी उतनी ही जवानी है॥
( जनाज़ा तेरा उठा जो, मय्यत में हम न आये
कब्र में तेरी बैठकर, मिलने के सपने सजाये ..
सोचा था दुनिया के डर से , उन्होंने हमें नहीं अपनाया
इसलिये कब्र में उनकी बैठकर, इंतज़ार करने को जी आया..
मेरे सनम ने पता नहीं, लोगों को क्या समझाया
लोगों ने आकर उनको, दूसरी कब्र में दफनाया..
ऐ खुदा , आज तुझसे सवाल करने को मन आया
लोग तो उसके थे पर आज तुझसे भी क्यों हमने दगा खाया … )
जनाज़ा तेरा उठने ना देंगे, गर मय्यत में तेरी हम आ न पाए,
कब्र तेरी खुदने भी ना देंगे, गर मरने से पहले हम ना मिल पाए,
दुनिया से डरते डरते भी तूने मेरे इलज़ाम अपने सर लगाये,
क्या जानते थे हमारे इंतज़ार में तूने भी कितने ज़ख्म हैं खाए,
मौत के बाद भी ऐ सनम तेरे वही तेवर फिर नज़र आये,
ऐ खुदा ऐसी क्या खता थी मेरी, कि हम उसे इतना भाये,
पहले तो हम पर खून का इलज़ाम लगवाकर, हमारा क़त्ल करवा दिए,
और ख्याल रख सको हमारा, इस खातिर कब्रिस्तान में भी पड़ोसी बना लिए॥
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20 January 2010
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( भूले है रफ्ता-रफ्ता उन्हें मुद्दतों में हम,
किश्तों में खुदकुशी का मज़ा हम से पूछिये... )
इसे खुद-कुशी का मंज़र नहीं, अकेलेपन का सबब कहिये हुज़ूर,
उन्हें भूल पाने का आसरा दिल कों देकर भी ये ज़ख्म-ऐ-जिगर कम नहीं हुआ करते॥
( न करता शिकायत ज़माने से कोई,
अगर मान जाता मनाने से कोई,
किसी कों क्यों याद करता कोई,
अगर भूल जाता भुलाने से कोई... )
शिकायतों का सिलसिला जो अब चल ही निकला है,
तो फिर दोष मत दो उन ज़ालिम हसीनाओं कों,
क्यूँकि दिल तो उनके सीने में भी धड़कता है, और याद हमें भी करता है,
बस फर्क इतना है कि हमें भूल पाने की कोशिश नहीं करते वो॥
( राह उनकी देखते देखते, आँखें फिर थका दीं
न आये वो तो क्या हुआ, अपनी तस्वीर तो भिजवा दीं
तस्वीर मे देखकर उनको आज, आज फिर हम शरमा गए
गुज़रे वक़्त की याद मे, आज फिर खुद को भुला गए... )
तेरी बंदगी ने हमें तेरे दामन में फिर से लाकर छोड़ दिया
अब कोई पहलू न भीगे, इसलिए अपना रास्ता मय-खाने की तरफ मोड़ दिया
छाया रहे हरदम तेरा बेदम नशा इस रूह पर ऐ नर्गिस-इ-कायनात,
ये ही सोच कर तेरे नाम का एक जाम अपने मय-कदे में अब से हमने जोड़ दिया॥
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( भूले है रफ्ता-रफ्ता उन्हें मुद्दतों में हम,
किश्तों में खुदकुशी का मज़ा हम से पूछिये... )
इसे खुद-कुशी का मंज़र नहीं, अकेलेपन का सबब कहिये हुज़ूर,
उन्हें भूल पाने का आसरा दिल कों देकर भी ये ज़ख्म-ऐ-जिगर कम नहीं हुआ करते॥
( न करता शिकायत ज़माने से कोई,
अगर मान जाता मनाने से कोई,
किसी कों क्यों याद करता कोई,
अगर भूल जाता भुलाने से कोई... )
शिकायतों का सिलसिला जो अब चल ही निकला है,
तो फिर दोष मत दो उन ज़ालिम हसीनाओं कों,
क्यूँकि दिल तो उनके सीने में भी धड़कता है, और याद हमें भी करता है,
बस फर्क इतना है कि हमें भूल पाने की कोशिश नहीं करते वो॥
( राह उनकी देखते देखते, आँखें फिर थका दीं
न आये वो तो क्या हुआ, अपनी तस्वीर तो भिजवा दीं
तस्वीर मे देखकर उनको आज, आज फिर हम शरमा गए
गुज़रे वक़्त की याद मे, आज फिर खुद को भुला गए... )
तेरी बंदगी ने हमें तेरे दामन में फिर से लाकर छोड़ दिया
अब कोई पहलू न भीगे, इसलिए अपना रास्ता मय-खाने की तरफ मोड़ दिया
छाया रहे हरदम तेरा बेदम नशा इस रूह पर ऐ नर्गिस-इ-कायनात,
ये ही सोच कर तेरे नाम का एक जाम अपने मय-कदे में अब से हमने जोड़ दिया॥
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10 January 2010
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( अश्कों के मायने खो गए, जब से हम दफ़न हो गए
करते-करते अकले बातें ,अरमान सारे ख़तम हो गए
जो पड़ोस से आई तेरी खुशबू, जज्बातों कों फिर हवा मिली
उठ बैठे कब्र में वापस, उम्मीद है फिर तेरे से वफ़ा की .... )
अकेले गुजारी है सारी ज़िन्दगी, दिल कों तेरी यादों का आसरा देके,
उठकर बैठे ज़रूर हैं, मगर ये न समझना कि हम सिर्फ तुझे ही देखे,
यहाँ और भी हसीनायें मौजूद हैं अपनी तबाही की दास्ताँ लेके,
आज बता भी दे कि ऐसा क्या था तुझमे ऐ कातिल, कि ये कदम सिर्फ तुझ पर बहके॥
( यादों का आसरा दिल को देते रहे, आँख उठी जब भी तेरे को ढूँढते रहे
तू न मिली तो ना सही, अपने आंसुओं से तेरी तस्वीर को भिगोते रहे
एक दिन आयेगी तू यही सोचकर, और हसीनों की तरफ कदमो कों जाने से रोकते रहे
ऐ कातिल तेरी एक झलक के लिए, ज़िन्दगी भर मयखाने का रास्ता खोजते रहे... )
जानते हैं कि तू लौट कर अब कभी नहीं आएगी, चाहे किसी और का दामन थाम लूँ
मगर तुझे पाने कि ये तलब कभी नहीं जाएगी, चाहे किसी और हसीना का नाम लूँ
ये मत समझना कि तेरी तस्वीर कों भिगोया है हमने अपने अश्कों से,
अश्क तो बहते हैं उन हसीनो के अक्सर, जिनके पहलू आज भी तेरे नाम से सजा कर रखूँ॥
( लौट कर आने वालों की राह हम फिर देखते नहीं
जो गुजर गया उसके बारे में कभी फिर सोचते नहीं
किससे क्या गिला करें, कोई यहाँ हमारा नहीं
यह ज़िन्दगी हमारी है और हमें इसे जीना है ... )
राह उनकी मत देखो अब कि आँखें थक जायेंगी,
और फिर उनके आते ही ये निगाहें भी झुक जायेंगी,
तब कहोगे कि गुज़रा वक़्त लौट आने कों बेताब है,
सारी शिकायतें वहीं दम तोड़ देंगी, रुक जायेंगी॥
( लौट कर आने वालों की राह देखना नहीं
गुजर गया जो उसके बारे में फिर सोचना नहीं
मिला आखिर सब कुछ एक तेरे सिवा, फिर क्या गिला
देख जरा गौर से, ज़िन्दगी मुसकरा रही है
फिर जीने के लिए बुला रही हैं, फिर जीने के लिए बुला रही हैं.. )
तू मिलेगी नहीं इसलिए राह तकना छोड़ दिया,
और फिर घूम के मंज़र ने भी अपना रास्ता मोड़ दिया,
मत घबराना ऐ शायर तू अपने हालात से, इस बात से,
तेरी ख़ुमारी ने हमें उनकी यादों से दोबारा जोड़ दिया॥
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( अश्कों के मायने खो गए, जब से हम दफ़न हो गए
करते-करते अकले बातें ,अरमान सारे ख़तम हो गए
जो पड़ोस से आई तेरी खुशबू, जज्बातों कों फिर हवा मिली
उठ बैठे कब्र में वापस, उम्मीद है फिर तेरे से वफ़ा की .... )
अकेले गुजारी है सारी ज़िन्दगी, दिल कों तेरी यादों का आसरा देके,
उठकर बैठे ज़रूर हैं, मगर ये न समझना कि हम सिर्फ तुझे ही देखे,
यहाँ और भी हसीनायें मौजूद हैं अपनी तबाही की दास्ताँ लेके,
आज बता भी दे कि ऐसा क्या था तुझमे ऐ कातिल, कि ये कदम सिर्फ तुझ पर बहके॥
( यादों का आसरा दिल को देते रहे, आँख उठी जब भी तेरे को ढूँढते रहे
तू न मिली तो ना सही, अपने आंसुओं से तेरी तस्वीर को भिगोते रहे
एक दिन आयेगी तू यही सोचकर, और हसीनों की तरफ कदमो कों जाने से रोकते रहे
ऐ कातिल तेरी एक झलक के लिए, ज़िन्दगी भर मयखाने का रास्ता खोजते रहे... )
जानते हैं कि तू लौट कर अब कभी नहीं आएगी, चाहे किसी और का दामन थाम लूँ
मगर तुझे पाने कि ये तलब कभी नहीं जाएगी, चाहे किसी और हसीना का नाम लूँ
ये मत समझना कि तेरी तस्वीर कों भिगोया है हमने अपने अश्कों से,
अश्क तो बहते हैं उन हसीनो के अक्सर, जिनके पहलू आज भी तेरे नाम से सजा कर रखूँ॥
( लौट कर आने वालों की राह हम फिर देखते नहीं
जो गुजर गया उसके बारे में कभी फिर सोचते नहीं
किससे क्या गिला करें, कोई यहाँ हमारा नहीं
यह ज़िन्दगी हमारी है और हमें इसे जीना है ... )
राह उनकी मत देखो अब कि आँखें थक जायेंगी,
और फिर उनके आते ही ये निगाहें भी झुक जायेंगी,
तब कहोगे कि गुज़रा वक़्त लौट आने कों बेताब है,
सारी शिकायतें वहीं दम तोड़ देंगी, रुक जायेंगी॥
( लौट कर आने वालों की राह देखना नहीं
गुजर गया जो उसके बारे में फिर सोचना नहीं
मिला आखिर सब कुछ एक तेरे सिवा, फिर क्या गिला
देख जरा गौर से, ज़िन्दगी मुसकरा रही है
फिर जीने के लिए बुला रही हैं, फिर जीने के लिए बुला रही हैं.. )
तू मिलेगी नहीं इसलिए राह तकना छोड़ दिया,
और फिर घूम के मंज़र ने भी अपना रास्ता मोड़ दिया,
मत घबराना ऐ शायर तू अपने हालात से, इस बात से,
तेरी ख़ुमारी ने हमें उनकी यादों से दोबारा जोड़ दिया॥
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