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( भूले है रफ्ता-रफ्ता उन्हें मुद्दतों में हम,
किश्तों में खुदकुशी का मज़ा हम से पूछिये... )
इसे खुद-कुशी का मंज़र नहीं, अकेलेपन का सबब कहिये हुज़ूर,
उन्हें भूल पाने का आसरा दिल कों देकर भी ये ज़ख्म-ऐ-जिगर कम नहीं हुआ करते॥
( न करता शिकायत ज़माने से कोई,
अगर मान जाता मनाने से कोई,
किसी कों क्यों याद करता कोई,
अगर भूल जाता भुलाने से कोई... )
शिकायतों का सिलसिला जो अब चल ही निकला है,
तो फिर दोष मत दो उन ज़ालिम हसीनाओं कों,
क्यूँकि दिल तो उनके सीने में भी धड़कता है, और याद हमें भी करता है,
बस फर्क इतना है कि हमें भूल पाने की कोशिश नहीं करते वो॥
( राह उनकी देखते देखते, आँखें फिर थका दीं
न आये वो तो क्या हुआ, अपनी तस्वीर तो भिजवा दीं
तस्वीर मे देखकर उनको आज, आज फिर हम शरमा गए
गुज़रे वक़्त की याद मे, आज फिर खुद को भुला गए... )
तेरी बंदगी ने हमें तेरे दामन में फिर से लाकर छोड़ दिया
अब कोई पहलू न भीगे, इसलिए अपना रास्ता मय-खाने की तरफ मोड़ दिया
छाया रहे हरदम तेरा बेदम नशा इस रूह पर ऐ नर्गिस-इ-कायनात,
ये ही सोच कर तेरे नाम का एक जाम अपने मय-कदे में अब से हमने जोड़ दिया॥
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