*****
( मुद्दतों बाद किसी से चाह हुई, मुद्दतों बाद किसी से दीदार हुआ
आज मिले फिर हम जब उनसे तो लगा कि फिर से इस दिल को प्यार हुआ॥ )
ख़यालों में किसी को लाकर हुआ ये एहसास, कि हमारे नसीब में नहीं है उनकी एक झलक
प्यार तो हम बहुत पीछे छोड़ आये, वो तो बस चाह को सहेज कर रखा है अब तलक..
( ख़यालों में किसी और को बसाये, नसीब अपना किसी और से बनाये
चाहत किसी और की दिल में दबाये, ऐसे लोगों को देवदास बोलते हैं समर भाई.. )
ज़माना कितनी भी करे चर्चा, हम बुझने ना देंगे चाहत की ये आस
ये ज़िल्लत-ए-रुसवाई सहने के बाद, कोई गिला नहीं गर लोग हमें फिर कहें देवदास या कालिदास..
( ख़यालों में कभी हमें भी लाकर देखो, अपना नसीब हमसे भी बना कर देखो
प्यार तो किया तुमने बहुत लोगों से अब तक, कभी हमें भी आज़मा कर देखो.. )
ये ख़यालों के साए न देंगे हमें जीने, और रहने तुमसे दूर
मुक़द्दर में नहीं प्यार तुम्हारा, हम तो बस खुश हैं पाकर ये सुरूर..
*****
No comments:
Post a Comment